मंगलवार, 26 मार्च 2013

जहां दहेज में मिलती है ट्रक की दो ट्यूब


मंगल थांडा आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले का एक ऐसा छोटा सा दूरदराज़ का गाँव है जहां शादी हो तो गरीब से गरीब परिवार को एक चीज़ अनिवार्य रूप से दहेज़ में देनी पड़ती है और वो है ट्रक की पुरानी टयूब.
इस अनूठे तोहफे का कारण ये है कि इस गांव का रास्ता एक नदी ने रोक रखा है. यहां के लोगों को अगर कोई चीज लेने बाहर जाना पड़ता है तो वो ट्यूब के सहारे ही नदी को पार करते हैं.
मंगल थांडा पहुंचने का रास्ता इतना खराब है कि वहां गाड़ी से पहुंचना संभव नहीं है. आप पैदल जाना चाहें तो पांच किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी.
इस गांव को दुनिया से जोड़ने का दूसरा रास्ता एक नदी "वाट्टे वागू" ने रोक रखा है. इसीलिए इस गांव के हर परिवार का जीवन ट्रक की ट्यूब पर टिका हुआ है जिसे ये लोग एक नाव के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

ट्यूब का सहारा

मंगल थांडा लम्बाडा आदिवासियों का एक ऐसा गांव है जो अपने राशन, स्कूल, अस्पताल, बैंक और सभी दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए नदी के उस पार स्थित सुरिपल्ली गांव पर निर्भर है.
वहां तक पहुंचने का एक मात्र माध्यम है ट्यूब जिसे उतना ही महत्व प्राप्त है जितना की डूबते हुए इंसान के लिए एक लाइफ़ जैकेट का होता है.
शायद इसीलिए हर माता पिता को अपनी बेटी के दहेज़ में एक नहीं, बल्कि दो ट्यूब देने पड़ते हैं. एक बेटी के लिए और दूसरा दामाद के लिए ताकि वो सुरक्षित तरीके से नदी पार जा आ सकें.
जब मैं इस गांव में गया तो हर घर के बाहर एक ट्यूब ऐसे रखी थी जैसे कोई गाड़ी रखी हो, या कोई जानवर बंधा हो.
गांव के एक युवा तेजावत नवीन ने बताया, "ट्यूब दिए बिना तो शादी की कल्पना भी नहीं हो सकती. पुराने ट्यूब की कीमत तीन सौ से पांच सौ रुपए होती है जबकि नई ट्यूब नौ सौ रुपए में मिलती है. मेरी शादी होगी तो मैं भी अपनी ससुराल से एक ट्यूब मांगूंगा".
ट्यूब इन लोगों के जीवन पर इतना छाया हुआ है कि जब एक नई नवेली दुल्हन कविता अपने मायके आई तो लोग उनसे ज्यादा उनकी ट्यूब की खैर खबर ले रहे थे.
एक और महिला तुक्कू भी वो दिन याद करके हंस रही थीं जब उनके विवाह में उनके पिता ने दो ट्यूब दिए थे. उनका कहना है कि हर वर्ष एक नई ट्यूब लेनी पड़ती है क्योंकि पुरानी ख़राब हो जाती है.

जानलेवा सफर

गांव के एक और व्यक्ति गुग्लत रामुलु का कहना है कि इस गांव में कोई सुविधा न होने से उन्हें हर चीज़ के लिए नदी पार सुरिपल्ली जाना पडता है जिसमें महीने का राशन भी शामिल होता है.
कभी कभी टयूब की ये यात्रा जानलेवा भी सिद्ध होती है.
गुस्से से भड़की भूक्य कोम्टी ने कहा, "दो वर्षों में चार लोग इस नदी को पार करने की कोशिश में डूब चुके हैं, इनमें तीन महिलाएं थीं. कभी पानी का बहाव इतना तेज़ हो जाता है कि यह ट्यूब भी हमें नहीं बचा सकती. आखिर हम कैसे जिंदा रहें. अगर हम दूसरे रास्ते से जाना चाहें तो कई घंटे लग जाते हैं. सुविधाओं का ये हाल है कि गांव में शौचालय तक नहीं है."
रास्ता न होने के कारण कोई अधिकारी यहां नहीं आता है और न ही किसी कल्याण योजना का लाभ इन लोगों को मिल पाता है.
स्वाभाविक है कि सबसे ज्यादा परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है वो भी गर्भवती महिलाओं को.
एक महिला जंबली ने बताया की बच्चे के जन्म के लिए अगर महिला को अस्पताल जाना पड़े तो कोई गाड़ी गांव तक नहीं आ सकती. अगर महिला को नरसमपेट अस्पताल जाना पड़े तो उसे पहले सुरिपल्ली गांव जाना होगा जबकि दूसरे रास्ते से आने वाला नेक्कुंदा का अस्पताल 12 किलोमीटर दूर है.
महिलाओं की तरह छात्रों को भी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि गांव के स्कूल में केवल दो कक्षाएं हैं और आगे पढ़ने के लिए उन्हें नदी पार सुरिपल्ली के स्कूल जाना पड़ता है.


शुक्रवार, 1 मार्च 2013

कुंभ में चली ऑस्ट्रेलियाई किसान की नौका


ऑस्ट्रेलिया के एक किसान एंड्र्यू टर्नर भारत के कुंभ मेले में ख़ुद की तैयार की गई नौका से तीर्थयात्रियों को संगम दर्शन करा रहे हैं.
दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक समागम में लाखों लोग संगम स्नान के लिए आते हैं और सैकड़ों लोग प्रति दिन गंगा-यमुना के संगम स्थल को देखने के लिए नाव की सवारी करते हैं.
आमतौर पर यहां एक घंटे तक नाव की सवारी का शुल्क तीन हज़ार रुपए तक हो सकता है.
स्थानीय मल्लाहों की इसी प्रतियोगी भीड़ में जहां पतवार और मोटर वाली नावें बहुतायत में हैं, एंड्र्यू टर्नर मुफ़्त में तीर्थयात्रियों को अपनी नाव की सवारी करा रहे हैं.

सपना

दो लोगों का एक परिवार टर्नर की क़रीब साढ़े पांच मीटर लंबी पतवार वाली नौका की सवारी कर जब लौटता है तो इस अनुभव को ‘शानदार’ और ‘जादुई’ क़रार देता है.
एंड्र्यू टर्नर ने 1989 में पहली बार कुंभ मेले में जाने के बाद से ही तीर्थयात्रियों को नाव की सवारी करने का सपना देखा था.
उस समय वो एक पर्यटक के रूप में भारत आए थे और घूमते हुए कुंभ मेले में पहुंच गए थे. उसके बाद अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने अमरीका में नाव बनाने की कला का अध्ययन भी किया.
उसके बाद वर्जीनिया 'जिन्नी' कैमरन से शादी के बाद संगम में नाव की फेरी लगाने का विचार परवान चढ़ा, लेकिन 2001 के कुंभ मेले में वो नहीं आ सके क्योंकि उनकी जुड़वां बेटियां उसी समय पैदा हुई थीं.
फिर कई साल तक योजना बनाने के बाद टर्नर ने सिडनी के उत्तर स्थित कॉम्बॉयने की अपनी 90 एकड़ की खेतीबाड़ी से अवकाश लिया और पिछले अक्तूबर में अपने परिवार के साथ इलाहाबाद के नज़दीक वाराणसी पहुंच गए.
भारत आने और कुंभ मेले में सेवा देने की वजह बताते हुए 45 वर्षीय चार बच्चों के पिता टर्नर कहते हैं, “पिछली बार जब मैं भारत में था तो मानवता में मेरा विश्वास और गहरा हुआ. मैं अकेला यात्रा कर रहा था और कई बार मेरी जान को भी ख़तरा पैदा हो गया और हर बार किसी न किसी भारतीय ने मेरी मदद की. इसीलिए मैं भारत आकर वो क़र्ज़ उतारना चाहता था.”
भारत के आभारी टर्नर के 11 से 20 वर्ष के बच्चे इलाहाबाद में हिंदी भाषा सीख रहे हैं.

सफ़र

भारत पहुंचने के बाद टर्नर पहले वाराणसी के बाहर एक फ़ार्म में रुके लेकिन स्थानीय भाषा की जानकारी के बिना नाव बनाने के लिए सामान जुटाने में उन्हें काफ़ी दिक़्क़त हुई.
इसीलिए कुंभ मेले की शुरुआत से कुछ महीने पहले वो परिवार के साथ मानवता के प्रति अपने अखंड विश्वास के साथ इलाहाबाद पहुंच गए.
वहां भी उनकी मदद कुछ अपरिचित लोगों ने ही की. उन्होंने टर्नर के रहने के लिए एक ऐसी जगह तलाशी जहां वो अपनी नाव बना सकते थे.
वहीं कुछ मित्रों और अपने बड़े बेटे रे की मदद से उनकी नाव आकार लेने लगी.
टर्नर के मेज़बान इवान और पूर्णिमा लामेच ने उन्हें बाइबिल कथा की तर्ज़ पर “नोआ” का नाम दिया. बाइबिल में नाव बनाने वाले पात्र का नाम नोआ था और उनके पिता का नाम लामेच था.
जनवरी के तीसरे हफ़्ते में टर्नर की नाव बनकर तैयार हो गई.
टर्नर ने इस नाव का नाम ‘करुणा’ रखा और 24 जनवरी को बैंडबाजे के साथ एक ट्रैक्टर पर सवार होकर ये नाव संगम तट पर पहुंची.
लेकिन उसे पानी में उतरने के लिए ज़रूरी काग़ज़ी कार्रवाई पूरी करने में 11 दिन और लग गए.

शिक्षा

उसके बाद से एंड्र्यू टर्नर, उनके बेटे और मित्र लगातार यात्रियों को नाव की सवारी करवा रहे हैं.
टर्नर ने इस सेवाकार्य को फ़रवरी के अंत तक जारी रखा. उसके बाद उनकी योजना पांच लाख की लागत वाली इस नाव को बेचकर कुछ रक़म हासिल करने और फिर स्वदेश लौटने की है.
इस कुंभ यात्रा से हुए लाभ के बारे में टर्नर की पत्नी कैमरन बताती हैं, “ये मेरे बच्चों के लिए बहुत बड़ी शिक्षा रही. मेरे दो बेटों ने नाव बनाने की कला सीखी. इसके साथ ही हमने ये भी देखा कि प्रदूषित होने के बावजूद गंगा नदी का लोग यहां कितना सम्मान करते हैं.”
जबकि एंड्र्यू टर्नर इस कुंभ यात्रा के बारे में कहते हैं, “हम अपने बच्चों को ये बता सके कि जीवन में वो जो कुछ भी करें, ज़रूरी ये है कि लगन के साथ करें. अगर वो ऐसा करेंगे तो कामयाबी मिलेगी. ये एक बड़ी सीख है.”

मिलिए 'चतुर' बीरबल के परिवार से


बुद्धिमान, हाज़िर जवाब और लोगों को लाजवाब कर देने वाले शहंशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल का नाम महेशदास दुबे था और वो मध्य प्रदेश के सिधी जिले के घोघरा में पैदा हुए थे.
दिन, महीने और साल दर साल बीतते चले गए मगर आज भी मध्य प्रदेश के सिधी जिले में सोन नदी के पार बसा घोघरा कमोबेश वैसा ही है जैसा कई सौ साल पहले हुआ करता था.

कहा जाता है कि घोघरा गांव में ही बीरबल के पिता गंगादास का घर हुआ करता था और यहीं उनकी माता अनाभा देवी नें वर्ष 1528 में रघुबर और महेश नाम के जुड़वां बच्चों को जन्म दिया. घोघरा गांव सालों से उपेक्षित ही रहा और इसके साथ-साथ उपेक्षित रहे बीरबल की पीढ़ी के लोग.कच्चे मकान, टूटी फूटी सडकें और उपेक्षा मानो इस इलाके की नियति बनकर रह गयी हो.

उपेक्षित

बीरबल की 37 वीं पीढ़ी भी इसी गांव में रह रही है और ये लोग मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं.
सिधी के रहने वाले साधू यादव कहते हैं कि इस परिवार से मिलने ज़्यादातर शोधकर्ता ही आते हैं. सरकारी अधिकारी और नेताओं को बीरबल के परिवार से कोई सरोकार नहीं है.
लोगों को अफ़सोस है कि सालों साल दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार हो या फिर प्रदेश की. किसी नें बीरबल की जन्मस्थली घोघरा के बारे में नहीं सोचा.
बीरबल की खिचड़ी तो कभी बन नहीं पायी. वो तो बादशाह अकबर की नसीहत के लिए खिचड़ी बना रहे थे. मगर हमारी खिचड़ी तो जल्द बन जाती है.""
गंगा दुबे
अलबत्ता जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने बीरबल की याद में एक सामुदायिक भवन का निर्माण करवाया. इसके अलावा घोघरा की पहचान के लिए कोई अलग पहल नहीं की गयी.
गांव के बुजुर्गों का कहना हैं कि अकबर के ज़माने में घोघरा महत्वपूर्ण रहा. मगर बाद में वक़्त बदलता चला गया और अहिस्ता अहिस्ता इस जगह की अहमियत कम होने लगी. अकबर के बाद दिल्ली और प्रदेश की सरकारों नें कभी इस गांव की तरफ मुड कर भी नहीं देखा.
एक नौजवान लड़के ने इस गांव से चलकर दिल्ली के दरबार तक का सफ़र तय किया. आज कई सालों के बाद भी दिल्ली की सरकारें घोघरा तक नहीं पहुंच पायीं हैं.

बीरबल के वंशज

गांव वालों से बात करते करते, मैं बीरबल के वंशजों के घर आ पहुंचा. छोटे से बगीचे में बसा कच्चा मकान. यहां मेरी मुलाक़ात बीरबल की 36 वीं पीढ़ी के गंगा दुबे से हुई जो पेशे से किसान हैं और गांव में एक छोटी सी परचून की दुकान भी चलाते हैं.
गंगा दुबे बताते हैं कि कई सालों तक बीरबल से जुड़े कई दस्तावेज़ उनके पास पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहे. मगर हाल ही में उनकी दुकान में पानी भर गया और उनमें से कुछ दस्तावेज़ नष्ट हो गए.
इन दस्तावेजों में रीवा के महाराजा का पत्र और अकबर के दरबार का हुक्म-नामा शामिल थे जो फारसी में लिखे हुए थे. गंगा के परिवार के पास बीरबल की कुछ दूसरी यादगार चीज़ें आज भी मौजूद हैं. मसलन शंख, घंटा और कुछ किताबें.
कहते हैं कि बीरबल फारसी और संस्कृत के विद्वान थे और कविताएं भी लिखा करते थे. इसके अलावा उनकी शिक्षा संगीत में भी हुई थी. यही वजह है कि सबसे पहले उन्हें जयपुर के महाराज के दरबार में और बाद में रीवा के महाराज के दरबार में बतौर राज कवि रखा गया था.
गांववालों का कहना है कि दरअसल रीवा के महाराज ने ही बादशाह अकबर को बीरबल तोहफे़ के रूप में दिया था. मगर इतिहासकार इससे सहमत नहीं हैं.

यादें

गंगा
गंगा के परिवार के पास बीरबल की कुछ यादगार चीज़ें में शंख, घंटा और कुछ किताबें मौजूद हैं
बीरबल की इस जन्मस्थली में उनसे जुड़ी यादगार चीज़ें लगभग अब नहीं के बराबर हैं. वक़्त के साथ सबकुछ ख़त्म होता चला गया. गांव के तालाब के किनारे वो घर जिसमे उनके माता पिता रहते थे, अब नहीं है.
ये जगह अब एक वीरान टीला है जहां जानवर चरते रहते हैं. कभी कभी गांव के नौजवान तालाब के किनारे इस टीले पर बैठकर अपना समय बिताते हैं.
अगर इतने सालों में इस गांव में कुछ नहीं बदला तो वो है घोघरा का प्राचीन मंदिर जहां बीरबल और उनके भाई जाया करते थे.
इस प्राचीन देवी के मंदिर के वयोवृद्ध पुजारी सुख्चंद्र सिंह का कहना है कि ऐसी मान्यता है कि यहीं से बीरबल को वरदान मिला था.
वो कहते हैं: "पहले ये मंदिर तालाब के किनारे था, बाद में देवी की मूर्ती को यहां स्थापित किया गया.
बीरबल का कोई बेटा नहीं था. कहा जाता है कि उनकी सिर्फ एक बेटी थी कमला, जिसने शादी नहीं की थी. इसलिए आज उनके भाई रघुबर ही उनके वंश को चला रहे हैं. घोघरा में ये विशवास है कि ऐसा देवी के वरदान की वजह से ही हुआ होगा.

सम्मान

गंगा दुबे के घर की बैठक में लोगों का आना जान लगा रहता है. बीरबल के वंशज होने की वजह से पूरे इलाके में उनका काफी सम्मान भी है. लोग उनके घर को फ़क्र के साथ देखते हैं और अक्सर इनके यहां गांव वालों की लंबी लंबी बैठकें भी होती हैं.
इनका परिवार भी खिचड़ी का शौकीन है. मगर गंगा कहते हैं कि उनके घर पर खिचड़ी जल्दी बन जाती.
वो हंसते हुए कहते हैं, "बीरबल की खिचड़ी तो कभी बन नहीं पायी. वो तो बादशाह अकबर की नसीहत के लिए खिचड़ी बना रहे थे. मगर हमारी खिचड़ी तो जल्द बन जाती है."
घोघरा में बीरबल और अकबर की नोक झोंक लगभग हर जुबां पर है. सिधी जिले के इस सुदूर इलाके में कभी बिजली रहती है कभी नहीं. गांव के लोग खाली समय में अकबर और बीरबल के किस्सों से ही अपना दिल बहलाते हैं.
गंगा दुबे इस गांव में अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहते हैं. इनकी दो बेटियां भी हैं जिनकी शादी हो चुकी है. बस किसी तरह इस परिवार का गुज़र बसर चलता है.
यूं कहा जा सकता है कि बीरबल के इस गांव को आज है किसी अकबर का इंतज़ार.