मंगल थांडा आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले का एक ऐसा छोटा सा दूरदराज़ का गाँव है जहां शादी हो तो गरीब से गरीब परिवार को एक चीज़ अनिवार्य रूप से दहेज़ में देनी पड़ती है और वो है ट्रक की पुरानी टयूब.
इस अनूठे तोहफे का कारण ये है कि इस गांव का रास्ता एक नदी ने रोक रखा है. यहां के लोगों को अगर कोई चीज लेने बाहर जाना पड़ता है तो वो ट्यूब के सहारे ही नदी को पार करते हैं.
मंगल थांडा पहुंचने का रास्ता इतना खराब है कि वहां गाड़ी से पहुंचना संभव नहीं है. आप पैदल जाना चाहें तो पांच किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी.
इस गांव को दुनिया से जोड़ने का दूसरा रास्ता एक नदी "वाट्टे वागू" ने रोक रखा है. इसीलिए इस गांव के हर परिवार का जीवन ट्रक की ट्यूब पर टिका हुआ है जिसे ये लोग एक नाव के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.
ट्यूब का सहारा
मंगल थांडा लम्बाडा आदिवासियों का एक ऐसा गांव है जो अपने राशन, स्कूल, अस्पताल, बैंक और सभी दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए नदी के उस पार स्थित सुरिपल्ली गांव पर निर्भर है.
वहां तक पहुंचने का एक मात्र माध्यम है ट्यूब जिसे उतना ही महत्व प्राप्त है जितना की डूबते हुए इंसान के लिए एक लाइफ़ जैकेट का होता है.
शायद इसीलिए हर माता पिता को अपनी बेटी के दहेज़ में एक नहीं, बल्कि दो ट्यूब देने पड़ते हैं. एक बेटी के लिए और दूसरा दामाद के लिए ताकि वो सुरक्षित तरीके से नदी पार जा आ सकें.
जब मैं इस गांव में गया तो हर घर के बाहर एक ट्यूब ऐसे रखी थी जैसे कोई गाड़ी रखी हो, या कोई जानवर बंधा हो.
गांव के एक युवा तेजावत नवीन ने बताया, "ट्यूब दिए बिना तो शादी की कल्पना भी नहीं हो सकती. पुराने ट्यूब की कीमत तीन सौ से पांच सौ रुपए होती है जबकि नई ट्यूब नौ सौ रुपए में मिलती है. मेरी शादी होगी तो मैं भी अपनी ससुराल से एक ट्यूब मांगूंगा".
ट्यूब इन लोगों के जीवन पर इतना छाया हुआ है कि जब एक नई नवेली दुल्हन कविता अपने मायके आई तो लोग उनसे ज्यादा उनकी ट्यूब की खैर खबर ले रहे थे.
एक और महिला तुक्कू भी वो दिन याद करके हंस रही थीं जब उनके विवाह में उनके पिता ने दो ट्यूब दिए थे. उनका कहना है कि हर वर्ष एक नई ट्यूब लेनी पड़ती है क्योंकि पुरानी ख़राब हो जाती है.
जानलेवा सफर
गांव के एक और व्यक्ति गुग्लत रामुलु का कहना है कि इस गांव में कोई सुविधा न होने से उन्हें हर चीज़ के लिए नदी पार सुरिपल्ली जाना पडता है जिसमें महीने का राशन भी शामिल होता है.
कभी कभी टयूब की ये यात्रा जानलेवा भी सिद्ध होती है.
गुस्से से भड़की भूक्य कोम्टी ने कहा, "दो वर्षों में चार लोग इस नदी को पार करने की कोशिश में डूब चुके हैं, इनमें तीन महिलाएं थीं. कभी पानी का बहाव इतना तेज़ हो जाता है कि यह ट्यूब भी हमें नहीं बचा सकती. आखिर हम कैसे जिंदा रहें. अगर हम दूसरे रास्ते से जाना चाहें तो कई घंटे लग जाते हैं. सुविधाओं का ये हाल है कि गांव में शौचालय तक नहीं है."
रास्ता न होने के कारण कोई अधिकारी यहां नहीं आता है और न ही किसी कल्याण योजना का लाभ इन लोगों को मिल पाता है.
स्वाभाविक है कि सबसे ज्यादा परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है वो भी गर्भवती महिलाओं को.
एक महिला जंबली ने बताया की बच्चे के जन्म के लिए अगर महिला को अस्पताल जाना पड़े तो कोई गाड़ी गांव तक नहीं आ सकती. अगर महिला को नरसमपेट अस्पताल जाना पड़े तो उसे पहले सुरिपल्ली गांव जाना होगा जबकि दूसरे रास्ते से आने वाला नेक्कुंदा का अस्पताल 12 किलोमीटर दूर है.
महिलाओं की तरह छात्रों को भी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि गांव के स्कूल में केवल दो कक्षाएं हैं और आगे पढ़ने के लिए उन्हें नदी पार सुरिपल्ली के स्कूल जाना पड़ता है.
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